Connect with us

उत्तराखंड

क्या धन उगाही का जरिया बन रह है शराब विरोधी आंदोलन..?

नेता जी का आंदोलन में कूदने का अपना नजरिया होता है वो भीड़ से मंच पर आते हैं जनता की दुखती रग को छेड़ते हैं और आवाम की पीड़ा भरी कराह जिंदाबाद जिंदाबाद की आवाज बनकर हलक से बाहर निकल पड़ती है । नेता जी का कहीं से भी नुकसान नहीं होता अगर जीत मिली तो जिंदाबाद हिस्से में आएगा और हार गए तो भी नाम सुर्खियां बटोर ले जाएगा। शायद कुछ यही कोशिश हो रही है देहरादून के कैनाल रोड़ पर, जहां आवंटित शराब की दुकान के बाहर विरोध का आंदोलन सुलगाने की कोशिश की जा रही है।

मातृशक्ति को आगे कर शराब की दुकान के विरोध के बहाने शायद अपनी इमेज पर सियासी लबादा पहनाने की कोशिशें हो रही है। तथाकथित आंदोलनकारी दुकान के मुलाजिमो को अपने नाम का रुआब दिखा रहे हैं ..जिस देश में दुनिया का सबसे बड़ा लिखित संविधान हो, सारे काम-काज कानून के मुताबिक चलने का वायदा जनता से किया गया हो, उसी देश में ये कह कर भी धमकाया जा रहा है कि, दुकान खुली तो देख लेना। मेरा नाम ये है मेरा नाम वो है बिल्कुल माफिया स्टाइल।

बहरहाल सोशल मीडिया में कैनाल रोड पर आवंटित शराब की दुकान का विरोध हॉट टॉपिक हो गया है। समाज पर पैनी नजर रखने वालों की राय है कि मौजूदा वक्त में शराब की दुकान का विरोध नेतागिरी की पहली सीढी है। आवाज उठाने पर अगर अलानी दीदी जिंदाबाद,फलाना भाई जिंदाबाद का नारा बुलंद हो गया तो तय है कि आपके नाम को सियासी गलियारे में नोटिस किया जाने लगेगा। लिहाजा टिकट के ख्वाहिशमंद ऐसे मौके को भुनाने के लिए हर संभव कोशिश करते हैं ताकि नाम को चर्चा मिल जाए।

यह भी पढ़ें 👉  उत्तराखंड में ओलावृष्टि का कहर: 23 हेक्टेयर फसल बर्बाद

ऐसे में कैनाल रोड की नई आवांटित दुकान के विरोध का आंदोलन सुर्खियां बटोर रहा है। पहले धमकाने का वीडियो वॉयरल हुआ और अब एक और ऑडियो सोशल मीडिया में वॉयरल हो रहा है जिसमें कहा जा रहा है कि आंदोलन को लंबा खींचना है जिसके लिए पैसे की जरूरत पड़ेगी और उन्हें लगता है कि हर घर से 500-500 रूपए इकट्ठे किए जाने चाहिए ताकि विरोध के आदोंलन का खर्चा-पानी निकल सके।

इस वीडियो के वॉयरल होने के बाद सवाल उठने लगे हैं कि आखिर कितने घरों से कलैक्शन होगा ? कहने वाले कह रहे हैं कि भैया ये शराब का विरोध नहीं बस पैसा बटोरने का आंदोलन बनने वाला है। कुछ ये भी कह रहे है कि चलो इसी बहाने चुनाव का खर्चा भी निकल सकता है और भीड़ पर चाय-पानी खर्च कर ऐने वक्त के लिए अपना अटूट समर्थक भी बनाया जा सकता है। क्योंकि सही कलैक्शन होगा तो न हींग लगेगी न फिटकरी लेकिन रंग तो चोखा आएगा। अपनी जेब से तो धेला भी खर्च नहीं होगा और विरोध के बहाने नाम हिट हो जाएगा। मतलब चुनावी साल में बल्ले-बल्ले।

यह भी पढ़ें 👉  भारतीय तेल टैंकर 'देश गरिमा' 22 अप्रैल को पहुँचेगा मुंबई; सुरक्षित भारत लौट रहे हैं 31 नाविक

बहरहाल असल सवाल ये है कि यही शराब है जो सरकार को सबसे ज्यादा राजस्व देती है विकास कार्यों के लिए। सड़क,बिजली.पानी,दवा,अस्पताल के खर्चे के लिए सबसे ज्यादा राजस्व यही शराब जुटाती है तो वहीं ये शराब नए नेताजी की नेतागिरी को भी चमकाती है। मासूम जनता तो बस बहना होता है असलियत में अपना नाम चमकाना होता है। लिहाजा जरूरत है दानिशमंद तबके को शराब विरोधी आंदोलन का लिटमस टेस्ट करने की ताकि भीड़ का हिस्सा बनी जनता समझ सके कि उनकी भावनाओं के साथ खेलने वाले कैसे-कैसे खेल खेलते हैं और वो कितनी आसानी से मोहरा बन जाती हैं।

More in उत्तराखंड

Trending News

Follow Facebook Page