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उत्तराखंड

स्वास्थ्य मंत्रालय का बड़ा फैसला: दूरदराज के इलाकों तक पहुंचने से पहले एक्सपायर नहीं होंगी विदेशी दवाएं

वर्तमान व्यवस्था में नियम यह था कि किसी दवा के आयात के लिए उसकी कुल शेल्फ लाइफ का न्यूनतम 60 प्रतिशत हिस्सा बचा होना जरूरी होता था, लेकिन कम शेल्फ लाइफ वाली दवाओं के मामले में यह नियम व्यावहारिक नहीं साबित हो पा रहा था और देश के दूरदराज इलाकों तक वितरित होने से पहले ही दवाएं एक्सपायर हो जाती थीं।

सरकार के इस नए नियम से आयातित दवाओं को परिवहन, गोदामों और वितरण नेटवर्क के माध्यम से मरीजों तक सुरक्षित पहुंचाने के लिए पर्याप्त समय मिलेगा, जिससे दवा आपूर्ति श्रृंखला अधिक प्रभावी बनेगी। मंत्रालय ने यह भी साफ किया है कि इस बदलाव से दवाओं के गुणवत्ता मानकों, सुरक्षा और प्रभावशीलता से किसी प्रकार का कोई समझौता नहीं किया जाएगा।

इस नए नियम के लागू होने से न केवल आवश्यक दवाओं की बर्बादी घटेगी, बल्कि अपेक्षाकृत अधिक वैधता वाली दवाएं मिलने से मरीजों, अस्पतालों और दवा विक्रेताओं के लिए इलाज के दौरान दवाओं की किल्लत और जोखिम काफी हद तक कम हो जाएंगे।

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केंद्र सरकार ने देश में आयातित दवाओं की उपलब्धता बढ़ाने और उनकी बर्बादी को रोकने के उद्देश्य से एक बड़ा नीतिगत कदम उठाया है। केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने ‘दवा नियम, 1945’ के नियम 31 में संशोधन का एक मसौदा जारी किया है, जिसके तहत अब केवल उन्हीं दवाओं को भारत में आयात करने की अनुमति दी जाएगी जिनकी भारत में प्रवेश के समय न्यूनतम ‘शेल्फ लाइफ’ कम से कम 12 महीने शेष बची हो।

वर्तमान व्यवस्था में नियम यह था कि किसी दवा के आयात के लिए उसकी कुल शेल्फ लाइफ का न्यूनतम 60 प्रतिशत हिस्सा बचा होना जरूरी होता था, लेकिन कम शेल्फ लाइफ वाली दवाओं के मामले में यह नियम व्यावहारिक नहीं साबित हो पा रहा था और देश के दूरदराज इलाकों तक वितरित होने से पहले ही दवाएं एक्सपायर हो जाती थीं।

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सरकार के इस नए नियम से आयातित दवाओं को परिवहन, गोदामों और वितरण नेटवर्क के माध्यम से मरीजों तक सुरक्षित पहुंचाने के लिए पर्याप्त समय मिलेगा, जिससे दवा आपूर्ति श्रृंखला अधिक प्रभावी बनेगी। मंत्रालय ने यह भी साफ किया है कि इस बदलाव से दवाओं के गुणवत्ता मानकों, सुरक्षा और प्रभावशीलता से किसी प्रकार का कोई समझौता नहीं किया जाएगा।

इस नए नियम के लागू होने से न केवल आवश्यक दवाओं की बर्बादी घटेगी, बल्कि अपेक्षाकृत अधिक वैधता वाली दवाएं मिलने से मरीजों, अस्पतालों और दवा विक्रेताओं के लिए इलाज के दौरान दवाओं की किल्लत और जोखिम काफी हद तक कम हो जाएंगे।

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