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उत्तराखंड वन्यजीव संघर्ष: वन मंत्री बोले- वैज्ञानिक अध्ययन कराएंगे, सरकार ने बढ़ाया मुआवजा

उत्तराखंड में मानव वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं, खासतौर पर भालुओं के असामान्य व्यवहार ने वन विभाग और सरकार की चिंता बढ़ा दी है। इस मामले पर वन मंत्री सुबोध उनियाल ने बड़ा बयान देते हुए कहा है कि यह पहली बार है जब भालुओं के व्यवहार में ऐसा बदलाव देखने को मिला है, जिसे गंभीरता से लिया जा रहा है। उन्होंने आगे बताया कि वन मंत्री ने बताया कि आमतौर पर जिस समय भालू और अन्य वन्यजीव हाइबरनेशन यानी स्लीपिंग मोड में चले जाते थे, उस दौरान वे आबादी की ओर नहीं आते थे, मगर चूंकि अब भालू हाइबरनेशन में नहीं जा रहे हैं तो वह लगातार सक्रिय रहकर भोजन की तलाश में गांवों और रिहायशी इलाकों तक पहुंच रहे हैं। वन मंत्री सुबोध उनियाल ने कहा कि प्रथम दृष्टया इसका सबसे बड़ा कारण जलवायु परिवर्तन माना जा रहा है, लिहाजा इस बिंदु को केंद्र में रखकर इस पूरे व्यवहार का वैज्ञानिक परीक्षण कराने के निर्देश दिए गए हैं।

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वन मंत्री ने कहा कि मानव–वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए सरकार और वन विभाग कई स्तरों पर कार्य जारी है। वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में सोलर लाइट लगाने का प्रावधान किया गया है, ताकि रात के समय जंगली जानवर गांवों में प्रवेश न करें, इसके साथ ही बुश कटर उपलब्ध कराए जा रहे हैं ताकि गांवों के आसपास झाड़ियां साफ की जा सकें और वन्यजीवों को छिपने का मौका न मिले। इसके अलावा वन विभाग द्वारा लगातार जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं, लोगों से अपील की जा रही है कि वे गांवों के आसपास फूड वेस्ट न फेंकें, क्योंकि यही वन्यजीवों के लिए सबसे आसान टारगेट होता है और इसी वजह से वे आबादी की ओर खिंचे चले आते हैं।

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बाइट _सुबोध उनियाल, वन मंत्री

मुआवजा देना नहीं, टकराव रोकना है उद्देश्य


सरकार की संवेदनशीलता को रेखांकित करते हुए वन मंत्री ने बताया कि मानव–वन्यजीव संघर्ष में जान गंवाने वालों के लिए मुआवजे की राशि को लगातार बढ़ाया गया है, पहले यह राशि 4 लाख थी, जिसे बढ़ाकर 6 लाख किया गया और अब इसे ₹10 लाख कर दिया गया है। वहीं, घायलों के लिए पहले तय 50 हजार की सीमा को भी समाप्त कर दिया गया है,अब वन्यजीव संघर्ष के दौरान इलाज पर आने वाला पूरा खर्च सरकार वहन करेगी। वन मंत्री ने साफ कहा कि सरकार का उद्देश्य सिर्फ मुआवजा देना नहीं, बल्कि मानव और वन्यजीवों के बीच टकराव को कम करना है, इसके लिए वैज्ञानिक अध्ययन, तकनीकी उपाय और जनभागीदारी—तीनों पर एक साथ काम किया जा रहा है।

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