उत्तराखंड
रेलवे यात्रियों के हक में सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, बिना टिकट मौत पर भी मिलेगा पूरा मुआवजा
नई दिल्ली। देश की सर्वोच्च अदालत ने रेल हादसों से जुड़े एक मामले में ऐतिहासिक और बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि किसी हादसे में जान गंवाने वाले यात्री के पास टिकट न मिलने का मतलब यह कतई नहीं है कि उसके परिवार को मुआवजा देने से इनकार कर दिया जाए। शीर्ष अदालत ने इस दायित्व को रेलवे कानून के तहत रेलवे की एक अनिवार्य और कल्याणकारी जिम्मेदारी बताया है।
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए रेलवे दावा अधिकरण और मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के उन पूर्व के आदेशों को पूरी तरह खारिज कर दिया है, जिनमें मृतक के पास टिकट न होने की तकनीकी वजह का हवाला देकर पीड़ित परिवार को मुआवजा देने से मना कर दिया गया था।
सर्वोच्च न्यायालय की इस पीठ ने केंद्र सरकार को सख्त हिदायत देते हुए लता नामक एक महिला को चार सप्ताह के भीतर 8 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश जारी किया है। इस पीड़िता के पति की साल 2015 में एक चलती हुई ट्रेन से नीचे गिरने के कारण दर्दनाक मौत हो गई थी। कोर्ट ने साफ चेताया है कि यदि इस तय समय सीमा में भुगतान नहीं किया जाता है, तो रेलवे को इस राशि पर 8 फीसदी वार्षिक ब्याज भी चुकाना होगा।
पीठ ने अपने फैसले की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया कि रेलवे अधिनियम मूल रूप से एक कल्याणकारी कानून है, इसलिए इसकी विधिक व्याख्या संकुचित न होकर हमेशा उदार और उद्देश्यपूर्ण होनी चाहिए। अदालत ने दोटूक कहा कि किसी भी प्रकार की तकनीकी कमियों या प्रक्रियाओं को ढाल बनाकर रेलवे को पीड़ितों को मुआवजा देने की अपनी जिम्मेदारी से बिल्कुल नहीं भागना चाहिए।
सर्वोच्च न्यायालय ने कानून की बारीकी समझाते हुए कहा कि रेलवे अधिनियम की धारा 124ए ‘नो-फॉल्ट लायबिलिटी’ के अकाट्य सिद्धांत पर पूरी तरह आधारित है। इस विशेष कानूनी धारा का मुख्य और एकमात्र उद्देश्य रेल हादसों के शिकार हुए पीड़ितों को बिना किसी प्रशासनिक देरी के तुरंत आर्थिक मुआवजा और राहत प्रदान करना है। इसके लिए पीड़ित पक्ष की ओर से किसी भी प्रकार की लापरवाही साबित करने की कोई कानूनी जरूरत नहीं होती है।
अदालत के नए दिशानिर्देशों के अनुसार, यदि कोई भी दावेदार एक कानूनी हलफनामा देकर यह स्पष्ट कर देता है कि मृत व्यक्ति वास्तविक रूप से एक पीड़ित यात्री था, तो उनकी शुरुआती जिम्मेदारी वहीं पूरी हो जाती है। इसके बाद यह पूरी तरह से रेलवे प्रशासन की जिम्मेदारी बन जाती है कि वह साक्ष्यों के साथ उसे गलत साबित करे।
भीड़ प्रबंधन और सुरक्षा पर कोर्ट की नसीहत
शीर्ष अदालत ने इस बड़े फैसले के साथ ही रेलवे की मौजूदा सुरक्षा व्यवस्था और स्टेशनों पर भीड़ प्रबंधन की लचर स्थिति पर भी अपनी गहरी चिंता प्रकट की है। कोर्ट ने रेखांकित किया कि देश में लगातार हो रहे हादसे भीड़ के असंतुलित होने के कारण ही सामने आ रहे हैं, और रेलवे को इस दिशा में सुरक्षा व्यवस्था सुधारने के लिए और अधिक कर्मचारियों व लोगों को तैनात करने की सख्त जरूरत है।
इसके साथ ही, अदालत ने यात्रियों को भी उनकी सुरक्षा के प्रति जागरूक रहने की कड़ी नसीहत दी है। शीर्ष अदालत ने कहा कि हर बात के लिए रेलवे को ही पूरी तरह जिम्मेदार ठहराना बिल्कुल ठीक नहीं है, यात्रियों को भी स्वयं सजग होना चाहिए। लोग अक्सर अपनी जान जोखिम में डालकर जबरन ट्रेन पकड़ने की जिद करते हैं, जिसे सुधारने की बेहद जरूरत है।
‘द्वितीय श्रेणी यात्री’ शब्द पर आपत्ति
सुप्रीम कोर्ट ने इस सुनवाई के दौरान ट्रेनों में द्वितीय श्रेणी में यात्रा करने वाले आम यात्रियों के लिए प्रयुक्त होने वाले ‘सेकंड क्लास पैसेंजर’ शब्द के इस्तेमाल पर भी अपनी बेहद सख्त आपत्ति दर्ज कराई है। कोर्ट ने कहा कि रेलवे के मैन्युअल में इस तरह के शब्दों का निरंतर इस्तेमाल किया जाना इंसानी गरिमा और समानता के संवैधानिक मूल्यों के पूरी तरह खिलाफ है।
अदालत ने रेलवे प्रशासन को एक महत्वपूर्ण सुझाव देते हुए कहा कि यह वर्गीकरण किसी यात्री की ओर से किए गए खर्च या उसकी आर्थिक स्थिति के बजाय सिर्फ कोच के लिए होना चाहिए, ताकि किसी भी नागरिक को उसके दर्जे से न आंका जाए। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि भारत के इतिहास में वर्ग विभाजन की पृष्ठभूमि को देखते हुए, किसी व्यक्ति को इस तरह संबोधित करना संविधान की मूल भावना के विपरीत है।




