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हाई कमान ने जताई नाराजगी तो सबके दरवाजे पर दस्तक देने को विवश हो गए नेता जी
उत्तराखंड की राजनीति इन दिनों फिर से गर्म है। भाजपा के भीतर कैबिनेट विस्तार की सुगबुगाहट तेज हो चुकी है और इसी बीच पूर्व मुख्यमंत्री की लगातार हो रही मुलाकातों ने राजनीतिक गलियारों में नई चर्चा छेड़ दी है।
पिछले दिनों उन्होंने भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव व उत्तराखंड प्रभारी दुष्यंत गौतम, उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री व वरिष्ठ नेता विजय बहुगुणा और पूर्व मुख्यमंत्री व पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ से अलग-अलग मुलाकात की। इन मुलाकातों को महज शिष्टाचार कह देना आसान है, लेकिन राजनीतिक हलकों में इन्हें उनकी नई रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।
सत्ता से बाहर लेकिन कोशिशें जारी
मुख्यमंत्री की कुर्सी गंवाने के बाद से ही उन्होंने लगातार खुद को सक्रिय दिखाने और प्रभाव बनाए रखने की जद्दोजहद में हैं। कैबिनेट विस्तार की चर्चाओं के बीच वे अपने समर्थकों को सरकार में जगह दिलाने की हरसंभव कोशिश कर रहे हैं।
यह पहली बार नहीं है। इससे पहले नगर निगम चुनाव में भी वे अपने करीबी सुनील उनियाल गामा को फिर से मेयर प्रत्याशी बनवाना चाहते थे, लेकिन टिकट मुख्यमंत्री धामी के करीबी सौरभ थपलियाल के खाते में चला गया। यह उदाहरण साफ दिखाता है कि भाजपा संगठन और सरकार पर अब मुख्यमंत्री धामी की पकड़ पहले से कहीं अधिक मज़बूत है।
अपने क्षेत्र में काम न करने के कारण भी रावत लगातार चर्चा में हैं। जनता में यह धारणा गहराती जा रही है कि वे क्षेत्रीय मुद्दों और विकास कार्यों पर ध्यान देने के बजाय अक्सर देहरादून और दिल्ली की राजनीति में ही ज़्यादा व्यस्त रहते हैं। नतीजा यह है कि स्थानीय जनता में उनकी छवि कमजोर हुई है और लोगों की नाराज़गी बढ़ रही है। कार्यकर्ताओं तक का मानना है कि पूर्व मुख्यमंत्री अपने क्षेत्र से ज़्यादा इधर-उधर की मुलाकातों और सियासी जोड़-तोड़ में समय देते हैं, जिससे उनकी राजनीतिक जमीन और खिसक रही है।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कम उम्र में जिस तरह राज्य की कमान संभाली और निर्णायक नेतृत्व से जनता व संगठन का भरोसा जीता, वह भाजपा की अंदरूनी राजनीति का सबसे बड़ा फैक्टर है। धामी सरकार आज केंद्र के भरोसे के साथ मजबूत स्थिति में है।
यही वजह है कि बार-बार अलग-अलग नेताओं से मुलाकात कर यह संदेश देने की कोशिश करते हैं कि वे अभी भी राजनीति में प्रासंगिक हैं और किसी भी समीकरण में उनकी गिनती हो सकती है। पर राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यह बेचैनी उस मछली की तरह है जो पानी से बाहर छटपटा रही हो।
आगे का संकेत
भाजपा के भीतर ये मुलाकातें आने वाले कैबिनेट विस्तार और संगठनात्मक समीकरणों से पहले की हलचल के रूप में देखी जा रही हैं। पार्टी का पूरा फोकस 2027 के कुंभ और विधानसभा चुनावों पर है। फिलहाल इतना साफ है कि उत्तराखंड की राजनीति का सबसे मज़बूत चेहरा आज मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी हैं और यही तथ्य त्रिवेंद्र रावत की बेचैनी की सबसे बड़ी वजह बन गया है।

