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उत्तराखंड

सुप्रीम कोर्ट ने पलटा हाईकोर्ट का फैसला, संविदाकर्मियों के अरमानों में फिरा पानी

समान काम के लिए समान वेतन की आस लगाए संविदाकर्मियों को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। सुप्रीम कोर्ट ने केरल हाई कोर्ट के आदेश को पलट दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने समान काम के लिए समान वेतन की मांग को सिरे खारिज कर दिया है। माननीय सुप्रीम कोर्ट ने दो टूक कहा है कि,संविदाकर्मियों और नियमित कर्मियों के कार्य, उत्तरदायित्व और नियुक्ति प्रक्रिया पूरी तरह अलग होती है, इसलिए समान वेतन नहीं दिया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने साफ-साफ कहा है कि संविदा पर तैनात मुलाजिम, स्थाई कर्मचारियों के समान वेतन और सुविधाओं के हकदार नहीं हो सकते. न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति पी.वी.वरले की पीठ ने केरल उच्च न्यायालय के पूर्व में दिए फैसले को रद्द करते हुए नया निर्णय दिया है।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने ये फरमान अतिथि प्रवक्ताओं के लिए सुनाया है लेकिन माना जा रहा है कि, इस फैसले से उन राज्य सरकारों को बड़ी राहत मिलेगी जिनका बजट घाटे का है और तकरीबन सभी सरकारी दफ्तरों में कम वेतन पर भारी तादाद में संविदा कर्मी नियुक्त किए गए हैं।

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आपको बता दें कि केरल उच्च न्यायालय ने अतिथि प्रवक्ताओं की पैरवी करते हुए विश्वविद्यालय को कहा था कि गेस्ट लेक्चरर्स से लंबे समय तक कम वेतन में पूरा काम करवाना शोषण के समान है लिहाजा उन्हें नियमित असिस्टेंट प्रोफेसर्स के समान वेतन दिया जाना चाहिए। हालांकि उच्च न्यायालय ने उन्हें नियमितीकरण का पात्र नहीं माना था।

हालांकि अब देखना ये दिलचस्प होगा कि वे राज्य सरकारे क्या कदम उठाती हैं जिन्होंने आंदोलनरत संविदाकर्मियों को समान काम के लिए समान वेतन देने का आश्वासन दिया हुआ है और उसके लिए हाथ पांव मार रही थी। बहरहाल वित्तीय बोझ से बचने के लिए अब सरकारे सुप्रीम कोर्ट की नजीर कर्मचारी संगठनों के समाने पेश कर सकती हैं।

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बेशक सुप्रीम कोर्ट ने संविदा कर्मियों को करारा झटका दिया है लेकिन ये सबक है उस सभी राज्य सरकारों के लिए जो अपनी जनता को पक्की नौकरी नहीं दे सकती और संविदा का लॉलीपॉप थमाकर उनसे अपना पूरा काम कराती है। इससे बेशक सरकार का काम बेहतरीन तरीके से चलता है लेकिन उन युवाओं का भविष्य अंधकारमय हो जाता है जो संविदा की सीढ़ी से पक्की नौकरी लपकना चाहते हैं।

ऐसे में कहा जा सकता है कि न तो सरकारों को नौजवानो के भविष्य से खेलना चाहिए और न नौजवानों को आश्वासनों का लॉलीपॉप चूसना चाहिए

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