उत्तराखंड
देहरादून कुमाऊं फाल्ट खतरा: उत्तराखंड भी अपनाए गुजरात मॉडल, बफर जोन बनाएं
राजधानी देहरादून में भविष्य में भूकंप से पड़ने वाले प्रभाव को लेकर IIT कानपुर के भू विज्ञान विभाग के क्षेत्र में उत्कृष्टता के लिए पहचाने जाने वाले डॉ. जावेद मलिक ने अपने तथ्यों से चेताया है। दरअसल, वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान में आयोजित कार्यशाला में शामिल होने आए डॉ. जावेद मलिक ने बताया कि देहरादून के रामनगर क्षेत्र में कोसी और दाबका नदी का प्रवाह क्षेत्र है, वहीं भू विज्ञान विभाग के विशेषज्ञों के अनुसार संभावना है कि यदि भविष्य में यहां भूकंप आता है तो इसके कारण लैंडस्केप पर दबाव पड़ेगा और दाबका नदी से कोसी नदी से मिल सकती है। चूंकि लैंडस्केप के बदलाव में भूकंप का भी योगदान होता है लिहाजा यह प्रवाह क्षेत्र को काफी चेंज करने का दम रखता है।
भू-विज्ञान विभाग के डॉ. जावेद मलिक ने बताया कि जहां पृथ्वी की टेक्टोनिक प्लेट एक-दूसरे के सापेक्ष खिसकती या टूटती है, जिससे अचानक ऊर्जा निकलती है उस क्षेत्र को फाल्ट लाइन कहा जाता है। इसके ऊपर कोई भी भारी और बड़ा निर्माण करना भविष्य में जान-माल की हानि को दोगुना करना होता है।
भूकंप ने बदला नदियों का प्रवाह क्षेत्र
वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान में आयोजित कार्यशाला में शामिल होने आए IIT कानपुर के भू-विज्ञान विभाग के डॉ. जावेद मलिक बताते हैं कि देहरादून क्षेत्र में भूकंप की प्रभाविकता को देखते हुए न केवल कई नई फाल्ट लाइन को खोजा गया बल्कि उनका नामकरण भी किया गया। इसके तहत कालाढूंगी और फाल्ट लाइन को चिह्नित किया गया है, शोधकर्ताओं के अनुसार कालाढूंगी फाल्ट लाइन का क्षेत्र 50 किमी लंबा है। यही कालाढूंगी फाल्ट लाइन मेन फ्रंटल थ्रस्ट (मुख्य फाल्ट) का हिस्सा है। डॉ. जावेद ने बताया कि कुमाऊं में साल 1505 और 1803 के जो दो बड़े भूकंप आए थे, यह कालाढूंगी फाल्ट लाइन उसी से जुड़ा हुआ है क्योंकि यहां पर उन दोनों बड़े भूकंप के अवशेष मिले हैं। अब यदि भविष्य में कभी अगर यहां पर भूकंप आता है तो लैंडस्केप में बदलाव होगा और दाबका-कोसी नदी से मिल जाएगी।
उत्तराखंड में भी बनाया जाए बफर ज़ोन
डॉ. जावेद मलिक ने आगे बताया कि हालांकि, ऐसा नहीं है कि भूतकाल में पहले कभी लैंडस्केप में बदलाव नहीं हुए, लेकिन मौजूदा समय में बौर और दाबका नदी का जो प्रवाह क्षेत्र है वह पहले नहीं था अर्थात दोनों का प्रवाह क्षेत्र अलग-अलग था। मगर जब भूकंप आए तो प्रवाह क्षेत्र में परिवर्तन हो गया। वहीं शोध से यह भी पता लगता है कि भूकंप के कारण जो लैंडस्केप परिवर्तन होता है उससे मानविय बसावट काफी प्रभावित होता है, लिहाजा ऐसी स्थिति में इसे समझना और भी आवश्यक हो जाता है। डॉ. जावेद कहते हैं कि फाल्ट लाइन में पूर्व में बड़े भूकंप आए और भविष्य में भी आ सकते हैं। डॉ. जावेद मलिक जावेद कहते हैं कि गुजरात में सबसे पहले फाल्ट लाइन को चिह्नित करने का काम शुरू किया गया था, इसमें बहुत साफ बफर जोन को भी चिह्नित किया गया था। इसी उत्तराखंड में भी गुजरात मॉडल की तर्ज पर उत्तराखंड में भी बफर जोन बनाया जाना है।





