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उत्तराखंड

उत्तराखंड में पशुपालन क्रांति: गोटवैली योजना से बेरोजगारी पर ब्रेक,

पशुपालन कभी सूबे की आर्थिकी हुआ करता था। पहाड़ से लेकर मैदानी इलाकों के गांव पशुधन से गुलजार थे। लेकिन वक्त बदला उत्तराखंड अलग पहाड़ी राज्य बना और पशुधन से लबरेज गांव धीरे-धीरे कंगाल होते चले गए। आज आलम ये है कि सूबे के गांवों में न आबादी है न पशुधन। सरकारों ने गांव की इस आर्थिकी पर गौर नहीं फरमाया नतीजा ये हुआ कि स्थानीय निवासियों की मानसिकता धीरे-धीरे बदल गई। अवाम ने पशुपालन जैसा रोजगार का साधन छोड़ दिया और दूध जैसी जरूरी चीज के लिए बाहरी राज्यों के दूध के पैकट पर निर्भर हो गए। आज मांस के लिए भी उत्तराखंड में भरपूर भेड़-बकरियां मछली और मुर्गियां नहीं है। राज्य में प्रोटीन का अच्छा स्रोत माने जाने वाला मांस भी बहारी राज्यों से आ रहा है। इतना ही नहीं देखा जा रहा है कि पड़ोसी राज्य हिमाचल के भेड़-बकरी पालक उत्तराखंड के जंगलों में अपने पशुधन को चुगा रहे हैं।

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बहरहाल सूबे के पशुपालन मंत्री सौरभ बहुगुणा की माने तो उनका महकमा पशुधन और उससे जुड़े रोजगार के साधनों पर फोकस कर रहा है ताकि जो रंगत खो गई है वो वापस लौट सके। सौरभ कहते हैं राज्य में पशुपालन को लेकर कई योजनाएं चल रही है. गोटवैली योजना का हवाला देते हुए पशुपालन मंत्री कहते हैं, चार हजार परिवारों को इस योजना के जरिए रोजगार से जोड़ा गया है। योजना उम्मीद जगा रही है। हालांकि होगा क्या ये तो वक्त बताएगा लेकिन वाकई में बेरोजगारी से जूझते और आबादी से रीते होते गांवों में पशुधन पर गौर फरमाने की जरूरत है. साथ ही उन वजहों को तलाशने की भी दरकार है जिनकी वजह से अवाम का मन पशुपालन जैसे स्वरोजगार से छिटका है। ताकि उत्तराखंड के गांव फिर से आबाद हो सकें और पशुधन राज्य की आर्थिकी को मजबूत कर सके।

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