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क्लाइमेट चेंज का बड़ा असर! भारत में लंबा हुआ मानसून का सीजन, जल्दी दस्तक देकर देर से होगी विदाई

भारत में मानसून का मिजाज और वर्षा ऋतु का चक्र तेजी से बदल रहा है, जिसके कारण अब मानसून देश में पहले से ज्यादा दिन बिताने लगा है. भारत मौसम विज्ञान विभाग द्वारा दक्षिण-पश्चिम मानसून के आगमन और उसकी वापसी की तिथियों को लेकर किए गए एक नए शोध में यह बात सामने आई है।

यह महत्वपूर्ण निष्कर्ष पिछले 120 वर्षों के मौसम संबंधी आंकड़ों के गहन विश्लेषण पर आधारित है. अध्ययन से पता चलता है कि अब मानसून तय समय से कुछ पहले दस्तक दे रहा है और निर्धारित वक्त के काफी बाद तक इसकी वापसी हो रही है. मौसम विभाग के वैज्ञानिकों ने अपने शोध पत्र में इस मानसून काल के लंबा होने के पीछे का मुख्य कारण वैश्विक जलवायु परिवर्तन और इसके प्रभाव से बदलते पर्यावरणीय परिवेश को बताया है।

मौसम वैज्ञानिकों द्वारा किए गए इस नए अध्ययन में देश भर में फैले 569 केंद्रों के वर्ष 1971 से 2000 तक के औसत पांच दिनों के वर्षा के आंकड़ों का उपयोग करके मानसून आगमन की एक नई समय-सारणी तैयार की गई है. इस शोध के निष्कर्षों से पता चलता है कि दक्षिण प्रायद्वीप के कुछ हिस्सों में मानसून का आगमन पुरानी तिथियों की तुलना में एक से तीन दिन पहले देखा गया है, जहां अब यह सामान्यतः 4 जून तक पहुंच जाता है।

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इसके विपरीत, मध्य भारत के पश्चिमी हिस्सों और उत्तर-पश्चिम भारत में मानसून के पहुंचने में 10 से 15 दिनों का विलंब पाया गया है, जिसके तहत पश्चिम-मध्य क्षेत्र में यह 10-12 जून, उत्तर भारत में 25 जून और संपूर्ण देश में 15 जुलाई तक पूरी तरह सक्रिय होता है।

इससे पहले उपयोग की जा रही मानसून के आगमन की सामान्य तिथियां बेहद पुराने आंकड़ों पर आधारित थीं, जो केवल 149 केंद्रों से प्राप्त किए गए थे, लेकिन इस नई और सटीक समय-सारणी की मदद से अब मौसम के पूर्वानुमानों की सटीकता में काफी सुधार होगा.

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मानसून की तिथियों और उसकी समयावधि में आ रहे इस सूक्ष्म लेकिन महत्वपूर्ण बदलाव का सीधा असर देश के कई प्रमुख क्षेत्रों पर पड़ने वाला है. वैज्ञानिकों का कहना है कि मानसून चक्र के लंबा होने और इसके आगमन व प्रस्थान के समय में हेरफेर होने के कारण देश का कृषि क्षेत्र, जल संसाधन प्रबंधन, शहरी नियोजन तथा आपदा प्रबंधन की तैयारियां व्यापक रूप से प्रभावित होंगी।

वर्तमान जलवायु परिस्थितियों के अनुसार मौसम के बदलते रुख की वजह से मानसून की समय-सारणी में ये दीर्घकालिक बदलाव आए हैं. हालांकि, इस नए शोध और इसके निष्कर्षों के सार्वजनिक होने के बाद अब सरकार और संबंधित विभागों को उक्त प्रभावों से प्रभावी ढंग से निपटने, फसलों के चक्र को व्यवस्थित करने और संभावित प्राकृतिक आपदाओं की पूर्व तैयारी करने में काफी मदद मिलेगी।

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