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उत्तराखंड

उत्तराखंड में मानव-वन्यजीव संघर्ष से मची चीख-पुकार, नागरिक सुरक्षा को लेकर वन विभाग कितना तैयार?

उत्तराखंड में इन दिनों मानव-वन्यजीव संघर्ष तेज हो चुका है, प्रदेश के पर्वतीय और ग्रामीण क्षेत्रों के बाद अब रिहायशी इलाकों में भी वन्य जीवों की चहलकदमी से यह विषय और भी गंभीर हो चुका है। डर यह है कि कहीं इस संघर्ष का खामियाज़ा बच्चों पर न पड़े, ऐसे में महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है कि क्या वन विभाग के पास उतना मानव संसाधन है जिससे वह स्कूली बच्चों को सुरक्षा प्रदान करने में सहायक साबित हो सकें? इस प्रश्न को लेकर वन विभाग के हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स रंजन कुमार मिश्र ने बताया कि जिन भी इलाकों को वन्य जीवों की मूवमेंट के कारण चिह्नित किया गया है, वहां पूरी फोर्स फोकस्ड तरीके से तैनात है। वहीं स्कूलों में जागरुकता अभियान चलाए जा रहे हैं, ताकि बच्चे भी खतरे को पहचान सके और खुद को सुरक्षित रख सकें। इसके अतिरिक्त जहां से भी वन विभाग को शिकायते प्राप्त हो रही हैं, वहां फायर वॉचर, फॉरेस्ट गार्ड और स्थानीय टीमें तुरंत तैनात की जा रही हैं, जबकि कुछ स्थानों पर बच्चों की सुरक्षा को देखते हुए स्कूल टाइमिंग बदलने का अनुरोध भी किया गया है।

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नागरिक सुरक्षा को लेकर वन विभाग कितना तैयार?


मानव-वन्यजीन संघर्ष को लेकर वन विभाग का कहना है कि संवेदनशील स्थानों पर गश्त बढ़ा दी गई है और विभाग की टीमें लगातार निगरानी में हैं। मगर प्रश्न अब भी ज्यों का त्यों बना हुआ है कि- क्या मैन पावर ही है इसका पर्याप्त निवारण? चूंकि हाल ही में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धाामी द्वारा वन विभाग संग बैठक में निर्देश दिए गए थे कि मानव–वन्यजीव संघर्ष की किसी भी घटना पर 30 मिनट में टीम मौके पर पहुंचे, जिसके लिए रेंजर और DFO को जिम्मेदारीयों को तय करने के लिए निर्देशित किया गया। वहीं अगर प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों की भौगोलिक परिस्थिति देखी जाए तो अनेक गांव ऐसे हैं जहां पहुंचने के लिए ही घंटो पैदल का सफर तय करना पड़ता है। अब बड़ा सवाल यही है कि यदि ऐसे क्षेत्र में बीच मार्ग पर कोई अप्रत्याशित घटना घटित होती है तो वन विभाग की टीम मात्र 30 मीनट को भीतर वहां कैसे पहुंच पाएगी ? जिसको लेकर वन विभाग के मुखिया रंजन कुमार मिश्र ने स्पष्ट किया कि बैठक में मुख्यमंत्री धामी द्वारा यह निर्देशित किया गया था कि रिएक्शन टाइम कम किया जाए, पर्वतीय क्षेत्रों की दूरी एक चुनौती अवश्य है लेकिन जैसे ही सूचना मिलती है तो जो भी अधिकारी सबसे निकट होता है रेंजर, डीएफओ, या स्थानीय टीम, उसे तुरंत घटनास्थल पर पहुंचना होगा। अर्थात किसी भी प्रकार की देरी अस्विकार्य है।

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भले ही विभाग का कहना है कि उनकी कोशिश है कि संवेदनशील क्षेत्रों में निगरानी और तेज की जाए, लेकिन पहाड़ी भौगोलिक परिस्थितियां व अस्थायी संसाधन अब भी बड़ी चुनौती बने हुए हैं….अब देखना यह होगा कि बढ़ते वन्यजीव मूवमेंट के बीच क्या वन विभाग बच्चों की सुरक्षा की असली परीक्षा में खरा उतर पाता है या नहीं…..

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