उत्तरकाशी
देवभूमि पर कुल्हाड़ी : पहाड़ की शान, गांव की जान, क्या हरियाली की कीमत पर बनेगी सड़क?
उत्तराखंड के धराली और थराली में आई आपदाओं की भयानक तस्वीरें आज भी लोगों की आंखों से ओझल नहीं हुई हैं।जहां पहाड़ दरक गए, सड़कें बह गईं और कई ज़िंदगियां मलबे में दब गईं।अपनों को खोने का दर्द आज भी उन परिवारों के दिलों में ताज़ा है।लेकिन सवाल ये है कि क्या हमने उस तबाही से कुछ सीखा?उसी देवभूमि में, जहां ज़ख्म अभी भरे भी नहीं हैं, आज फिर विकास के नाम पर हजारों पेड़ों पर कुल्हाड़ी चलाने की तैयारी हो रही है।
उत्तरकाशी में हजारों पेड़ों की कटान का विरोध अभी थमा भी नहीं था कि अब बागेश्वर से एक और चिंताजनक खबर सामने आ गई है।राष्ट्रीय राजमार्ग के नाम पर पेड़ों को काटने की तैयारी…बागेश्वर जिले में बागेश्वर–कांडा राष्ट्रीय राजमार्ग को चौड़ा और आधुनिक बनाने की प्रक्रिया तेज हो चुकी है। लेकिन इस विकास के रास्ते में 5745 पेड़ों की बलि तय मानी जा रही है। वन विभाग के मुताबिक, इस परियोजना का सबसे बड़ा हिस्सा बागेश्वर जिले में पड़ता है,यही वजह है कि सबसे ज्यादा वृक्ष कटान भी यहीं होगा। कटने वाले पेड़ों में देवदार, बांज, काफल, अखरोट, जामुन, आम, नाशपाती और कई फलदार प्रजातियां शामिल हैं। पहाड़ की पहचान माने जाने वाले पेड़ अब खतरे में हैं।वन विभाग का कहना है कि नियमों के तहत हर एक कटे पेड़ के बदले चार गुना पौधारोपण किया जाएगा। लेकिन सवाल ये है —क्या कागज़ों पर लगा पौधा, सदियों पुराने देवदार के वृक्षों की जगह ले पायेगा।
क्या हरियाली की कीमत पर बनेगी सड़क?
बीते कुछ वर्षों में भूस्खलन, बाढ़ और सड़क धंसने की घटनाएं लगातार बढ़ी हैं।विशेषज्ञ चेतावनी दे चुके हैं कि ढलानों से पेड़ हटाना भविष्य की आपदाओं को न्योता देना है।हजारों पेड़ों की बलि, पहाड़ों की कमजोर होती जड़ें। सरकार की विकास नीति पर सवाल खड़े कर रही है। पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन की समस्या पहले से ही गंभीर रही है, विशेषकर बरसात के महीनों में। पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि बड़ी संख्या में पेड़ हटने के बाद ढलानों की स्थिरता पर असर पड़ सकता है और भविष्य में भूस्खलन की घटनाएं और बढ़ सकती हैं। इसी वजह से पर्यावरण प्रेमी इस परियोजना पर सवाल उठा रहे हैं और प्राकृतिक संतुलन को लेकर आशंकाएं जता रहे हैं। गौरतलब है कि हाल ही में उत्तरकाशी में भी 6000 से अधिक पेड़ों की कटान को लेकर विरोध जारी है।अब बागेश्वर में भी वही कहानी दोहराई जा रही है,पेड़ों को चिन्हित कर लिया गया है,और प्रशासन अंतिम प्रक्रिया में जुटा है।





